Top Hindi Poems Of Sohanlal Dwivedi | ” सोहनलाल द्विवेदी की हिंदी कविताएँ “

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Famous Hindi Poems सूचना वेबसाइट पर हिंदी में Sohanlal Dwivedi के बारे में पढ़ने के लिए हमारी वेबसाइट पर आपका बहुत स्वागत है। नमस्कार दोस्तों, मेरा नाम Altaf Hassan और आज की पोस्ट में, आप सोहनलाल द्विवेदी की हिंदी कविताएं पढ़ेंगे ।

सोहनलाल द्विवेदी एक भारतीय कवि, गांधीवादी और स्वतंत्रता सेनानी थे, जो अपनी देशभक्ति कविताओं के लिए जाने जाते है। जैसे तुमहे नमन, A Poem On महात्मा गांधी, अली रचो चंद, खादी गीत, गिरिराज, नयनों की रेशम डोरी से, मातृभूमि, प्राकृत संधेश, जय राष्ट्र निधान, रे मन, वंदना और हिमालय।

Sohanlal Dwivedi के जीवन से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें।

Sohanlal Dwivedi ( 22 February 1906 – 1 March 1988 ) भारत के उत्तर प्रदेश के फतेहपुर के एक छोटे से शहर बिंदकी में जन्मे। इन्होने महात्मा गांधी पर कई भाव पूर्ण रचनाएँ लिखी है, जो हिन्दी जगत में नितान्त लोकप्रिय हुई हैं। उनकी रचनाएँ ऊर्जावान हैं और राष्ट्रवाद को दर्शाती हैं। इसके अलावा, उन्होंने भारत के देश, ध्वज, राष्ट्र के प्रति प्रेम और राष्ट्र के नेताओं के बारे में बड़ी कविताएँ लिखी हैं। द्विवेदी जी ने कई अभियान गीत और प्रयाण गीत भी रचे।

इन प्रियान गीतों ने एक सार्वजनिक संबोधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें भारत सरकार द्वारा 1970 में चौथे सर्वोच्च भारतीय नागरिक Padma Shri से भी सम्मानित किया गया था। सोहनलाल द्विवेदी स्वतंत्रता आंदोलन के युग के सबसे महान कवियों में से एक थे, जिन्होंने जनता में राष्ट्रीय जागरूकता जगाने के लिए अपनी सारी शक्ति झोंक दी, नौजवानों में देशभक्ति की भावना जगाई और देश के लिए सबसे बड़ा बलिदान दिया।

जहाँ तक मुझे याद है, जिस कवि को सबसे पहले राष्ट्रकवि का नाम दिया गया था उनका नाम सोहन लाल द्विवेदी था। सोहनलाल द्विवेदी कविताएं बहुत ही प्रसिद्ध थे, तो आइये और देखते है Sohanlal Dwivedi कुछ बेहतरीन कविताएं हिंदी में।

Top Hindi Poems Of Sohanlal Dwivedi | ” सोहनलाल द्विवेदी की कविताएँ ”

1. ” हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं ” – Famous Sohanlal Dwivedi Poems

Sohanlal Dwivedi

हम नन्हे-नन्हे बच्चे हैं,
नादान उमर के कच्चे हैं,
पर अपनी धुन के सच्चे हैं!
जननी की जय-जय गाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

अपना पथ कभी न छोड़ेंगे,
अपना प्रण कभी न तोड़ेंगे,
हिम्मत से नाता जोड़ेंगे!
हम हिम गिर पर चढ़ जाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

हम भय से कभी न डोलेंगे,
अपनी ताकत को तोलेंगे,
माता के बंधन खोलेंगे!
हम इसकी शान बढ़ाएँगे,
भारत की ध्वजा उड़ाएँगे!

2. ” युगावतार गांधी

Sohanlal Dwivedi

चल पड़े जिधर दो डग मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गये कोटि दृग उसी ओर,

जिसके शिर पर निज धरा हाथ
उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ,
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गये उसी पर कोटि माथ,

हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु!
हे कोटिरूप, हे कोटिनाम!
तुम एकमूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि
हे कोटिमूर्ति, तुमको प्रणाम!

युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की
खींचते काल पर अमिट रेख,

तुम बोल उठे, युग बोल उठा,
तुम मौन बने, युग मौन बना,
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर
युगकर्म जगा, युगधर्म तना,

युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक,
युग-संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें
युग-युग तक युग का नमस्कार!

तुम युग-युग की रूढ़ियाँ तोड़
रचते रहते नित नई सृष्टि,
उठती नवजीवन की नींवें
ले नवचेतन की दिव्य-दृष्टि,

धर्माडंबर के खँडहर पर
कर पद-प्रहार, कर धराध्वस्त
मानवता का पावन मंदिर
निर्माण कर रहे सृजनव्यस्त!

बढ़ते ही जाते दिग्विजयी!
गढ़ते तुम अपना रामराज,
आत्माहुति के मणिमाणिक से
मढ़ते जननी का स्वर्णताज!

तुम कालचक्र के रक्त सने
दशनों को कर से पकड़ सुदृढ़,
मानव को दानव के मुँह से
ला रहे खींच बाहर बढ़ बढ़,

पिसती कराहती जगती के
प्राणों में भरते अभय दान,
अधमरे देखते हैं तुमको,
किसने आकर यह किया त्राण?

दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से
तुम कालचक्र की चाल रोक,
नित महाकाल की छाती पर
लिखते करुणा के पुण्य श्लोक!

कँपता असत्य, कँपती मिथ्या,
बर्बरता कँपती है थरथर!
कँपते सिंहासन, राजमुकुट
कँपते, खिसके आते भू पर,

हैं अस्त्र-शस्त्र कुंठित लुंठित,
सेनायें करती गृह-प्रयाण!
रणभेरी तेरी बजती है,
उड़ता है तेरा ध्वज निशान!

हे युग-दृष्टा, हे युग-स्रष्टा,
पढ़ते कैसा यह मोक्ष-मंत्र?
इस राजतंत्र के खँडहर में
उगता अभिनव भारत स्वतंत्र!

3. ” रे मन ” – Best Sohanlal Dwivedi Poems

Sohanlal Dwivedi

प्रबल झंझावत में तू
बन अचल हिमवान रे मन।

हो बनी गम्भीर रजनी,
सूझती हो न अवनी,
ढल न अस्ताचल अतल में
बन सुवर्ण विहान रे मन।

उठ रही हो सिन्धु लहरी
हो न मिलती थाह गहरी
नील नीरधि का अकेला
बन सुभग जलयान रे मन।

कमल कलियाँ संकुचित हो,
रश्मियाँ भी बिछलती हो,
तू तुषार गुहा गहन में
बन मधुप की तान रे मन।

4. ” मीठे बोल

Sohanlal Dwivedi

मीठा होता खस्ता खाजा
मीठा होता हलुआ ताजा,
मीठे होते गट्टे गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

मीठे होते आम निराले
मीठे होते जामुन काले,
मीठे होते गन्ने गोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

मीठा होता दाख छुहारा
मीठा होता शक्कर पारा,
मीठा होता रस का घोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

मीठी होती पुआ सुहारी
मीठी होती कुल्फी न्यारी,
मीठे रसगुल्ले अनमोल
सबसे मीठे, मीठे बोल।

5. ” हिमालय ” – Sohanlal Dwivedi Poems

Sohanlal Dwivedi

युग युग से है अपने पथ पर
देखो कैसा खड़ा हिमालय!
डिगता कभी न अपने प्रण से
रहता प्रण पर अड़ा हिमालय!

जो जो भी बाधायें आईं
उन सब से ही लड़ा हिमालय,
इसीलिए तो दुनिया भर में
हुआ सभी से बड़ा हिमालय!

अगर न करता काम कभी कुछ
रहता हरदम पड़ा हिमालय
तो भारत के शीश चमकता
नहीं मुकुट–सा जड़ा हिमालय!

खड़ा हिमालय बता रहा है
डरो न आँधी पानी में,
खड़े रहो अपने पथ पर
सब कठिनाई तूफानी में!

डिगो न अपने प्रण से तो
सब कुछ पा सकते हो प्यारे!
तुम भी ऊँचे हो सकते हो
छू सकते नभ के तारे!!

अचल रहा जो अपने पथ पर
लाख मुसीबत आने में,
मिली सफलता जग में उसको
जीने में मर जाने में!

6. ” गुरू और चेला

Sohanlal Dwivedi

गुरू एक थे, और था एक चेला,
चले घूमने पास में था न धेला।

चले चलते-चलते मिली एक नगरी,
चमाचम थी सड़कें चमाचम थी डगरी।
मिली एक ग्वालिन धरे शीश गगरी,
गुरू ने कहा तेज ग्वालिन न भग री।

बता कौन नगरी, बता कौन राजा,
कि जिसके सुयश का यहाँ बजता बाजा।
कहा बढ़के ग्वालिन ने महाराज पंडित,
पधारे भले हो यहाँ आज पंडित।

यह अंधेर नगरी है अनबूझ राजा,
टके सेर भाजी, टके सेर खाजा।
मज़े में रहो, रोज लड्डू उड़ाओ,
बड़े आप दुबले यहाँ रह मुटाओ।

खबर सुनके यह खुश हुआ खूब चेला,
कहा उसने मन में रहूँगा अकेला।
मिले माल पैसे का दूँगा अधेला,
मरेंगे गुरू जी मुटायेगा चेला।

गुरू ने कहा-यह है अंधेर नगरी,
यहाँ पर सभी ठौर अंधेर बगरी।
किसी बात का ही यहाँ कब ठिकाना?
यहाँ रहके अपना गला ही फँसाना।

गुरू ने कहा-जान देना नहीं है,
मुसीबत मुझे मोल लेना नहीं है।
न जाने की अंधेर हो कौन छन में?
यहाँ ठीक रहना समझता न मन में।

गुरू ने कहा किन्तु चेला न माना,
गुरू को विवश हो पड़ा लौट जाना।
गुरूजी गए, रह गया किन्तु चेला,
यही सोचता हूँगा मोटा अकेला।

चला हाट को देखने आज चेला,
तो देखा वहाँ पर अजब रेल-पेला।
टके सेर हल्दी, टके सेर जीरा,
टके सेर ककड़ी, टके सेर खीरा।

टके सेर मिलता था हर एक सौदा,
टके सेर कूँड़ी, टके सेर हौदा।
टके सेर मिलती थी रबड़ी मलाई,
बहुत रोज़ उसने मलाई उड़ाई।

सरंगी था पहले हुआ अब मुटल्ला,
कि सौदा पड़ा खूब सस्ता पल्ला।
सुनो और आगे का फिर हाल ताजा।
थी अन्धेर नगरी, था अनबूझ राजा।

बरसता था पानी, चमकती थी बिजली,
थी बरसात आई, दमकती थी बिजली।
गरजते थे बादल, झमकती थी बिजली,
थी बरसात गहरी, धमकती थी बिजली।

लगी ढाने दीवार, मकान क्षण क्षण,
लगी चूने छत, भर गया जल से आँगन।
गिरी राज्य की एक दीवार भारी,
जहाँ राजा पहुँचे तुतर ले सवारी।

झपट संतरी को डपट कर बुलाया,
गिरी क्यों यह दीवार, किसने गिराया?
कहा सन्तरी ने-महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, या मेरा करतब!

यह दीवार कमजोर पहले बनी थी,
इसी से गिरी, यह न मोटी घनी थी।
खता कारीगर की महाराज साहब,
न इसमें खता मेरी, या मेरा करतब!

बुलाया गया, कारीगर झट वहाँ पर,
बिठाया गया, कारीगर झट वहाँ पर।
कहा राजा ने-कारीगर को सज़ा दो,
ख़ता इसकी है आज इसको कज़ा दो।

कहा कारीगर ने, ज़रा की न देरी,
महाराज! इसमें ख़ता कुछ न मेरी।
यह भिश्ती की ग़लती यह उसकी शरारत,
किया गारा गीला उसी की यह गफलत।

कहा राजा ने-जल्द भिश्ती बुलाओ।
पकड़ कर उसे जल्द फाँसी चढ़ाओ।
चला आया भिश्ती, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने-इसमें खता कुछ न मेरी।

यह गलती है जिसने मशक को बनाया,
कि ज्यादा ही जिसमें था पानी समाया।
मशकवाला आया, हुई कुछ न देरी,
कहा उसने इसमें खता कुछ न मेरी।

यह मन्त्री की गलती है मन्त्री की गफलत,
उन्हीं की शरारत, उन्हीं की है हिकमत।
बड़े जानवर का था चमड़ा दिलाया,
चुराया न चमड़ा मशक को बनाया।

बड़ी है मशक खूब भरता है पानी,
ये गलती न मेरी, यह गलती बिरानी।
है मन्त्री की गलती तो मन्त्री को लाओ,
हुआ हुक्म मन्त्री को फाँसी चढ़ाओ।

हुआ मन्त्री हाजिर बहुत गिड़गिड़ाया,
मगर कौन सुनता था क्या बिड़ड़िाया।
चले मन्त्री को लेके जल्लाद फौरन,
चढ़ाने को फाँसी उसी दम उसी क्षण।

मगर मन्त्री था इतना दुबला दिखाता,
न गरदन में फाँसी का फंदा था आता।
कहा राजा ने जिसकी मोटी हो गरदन,
पकड़ कर उसे फाँसी दो तुम इसी क्षण।

चले संतरी ढूँढ़ने मोटी गरदन,
मिला चेला खाता था हलुआ दनादन।
कहा सन्तरी ने चलें आप फौरन,
महाराज ने भेजा न्यौता इसी क्षण।

बहुत मन में खुश हो चला आज चेला,
कहा आज न्यौता छकूँगा अकेला!!
मगर आके पहुँचा तो देखा झमेला,
वहाँ तो जुड़ा था अजब एक मेला।

यह मोटी है गरदन, इसे तुम बढ़ाओ,
कहा राजा ने इसको फाँसी चढ़ाओ!
कहा चेले ने-कुछ खता तो बताओ,
कहा राजा ने-‘चुप’ न बकबक मचाओ।

मगर था न बुद्धु-था चालाक चेला,
मचाया बड़ा ही वहीं पर झमेला!!
कहा पहले गुरु जी के दर्शन कराओ,
मुझे बाद में चाहे फाँसी चढ़ाओ।

गुरूजी बुलाये गये झट वहाँ पर,
कि रोता था चेला खड़ा था जहाँ पर।
गुरू जी ने चेले को आकर बुलाया,
तुरत कान में मंत्र कुछ गुनगुनाया।

झगड़ने लगे फिर गुरू और चेला,
मचा उनमें धक्का बड़ा रेल-पेला।
गुरू ने कहा-फाँसी पर मैं चढ़ूगा,
कहा चेले ने-फाँसी पर मैं मरूँगा।

हटाये न हटते अड़े ऐसे दोनों,
छुटाये न छुटते लड़े ऐसे दोनों।
बढ़े राजा फौरन कहा बात क्या है?
गुरू ने बताया करामात क्या है।

चढ़ेगा जो फाँसी महूरत है ऐसी,
न ऐसी महूरत बनी बढ़िया जैसी।
वह राजा नहीं, चक्रवर्ती बनेगा,
यह संसार का छत्र उस पर तनेगा।

कहा राजा ने बात सच गर यही
गुरू का कथन, झूठ होता नहीं है
कहा राजा ने फाँसी पर मैं चढूँगा
इसी दम फाँसी पर मैं ही टँगूँगा।

चढ़ा फाँसी राजा बजा खूब बाजा
थी अन्धेर नगरी, था अनबूझ राजा
प्रजा खुश हुई जब मरा मूर्ख राजा
बजा खूब घर घर बधाई का बाजा।

7. ” नयनों की रेशम डोरी से ” – Sohanlal Dwivedi Poems

Sohanlal Dwivedi

नयनों की रेशम डोरी से
अपनी कोमल बरजोरी से।

रहने दो इसको निर्जन में
बांधो मत मधुमय बन्धन में,
एकाकी ही है भला यहाँ,
निठुराई की झकझोरी से।

अन्तरतम तक तुम भेद रहे,
प्राणों के कण कण छेद रहे।
मत अपने मन में कसो मुझे
इस ममता की गँठजोरी से।

8. ” भारत ” – Sohanlal Dwivedi

Sohanlal Dwivedi

भारत तू है हमको प्यारा,
तू है सब देशों से न्यारा।

मुकुट हिमालय तेरा सुन्दर,
धोता तेरे चरण समुन्दर।

गंगा यमुना की हैं धारा,
जिनसे है पवित्र जग सारा।

अन्न फूल फल जल हैं प्यारे,
तुझमें रत्न जवाहर न्यारे!

राम कृष्ण से अन्तर्यामी,
तेरे सभी पुत्र हैं नामी।

हम सदैव तेरा गुण गायें,
सब विधि तेरा सुयश बढ़ायें।

9. ” जी होता चिड़िया बन जाऊँ ” – Sohanlal Dwivedi Poems

Sohanlal Dwivedi

जी होता, चिड़िया बन जाऊँ!
मैं नभ में उड़कर सुख पाऊँ!

मैं फुदक-फुदककर डाली पर,
डोलूँ तरु की हरियाली पर,
फिर कुतर-कुतरकर फल खाऊँ!
जी होता चिड़िया बन जाऊँ!

कितना अच्छा इनका जीवन?
आज़ाद सदा इनका तन-मन!
मैं भी इन-सा गाना गाऊँ!
जी होता, चिड़िया बन जाऊँ!

जंगल-जंगल में उड़ विचरूँ,
पर्वत घाटी की सैर करूँ,
सब जग को देखूँ इठलाऊँ!
जी होता चिड़िया बन जाऊँ!

कितना स्वतंत्र इनका जीवन?
इनको न कहीं कोई बंधन!
मैं भी इनका जीवन पाऊँ!
जी होता चिड़िया बन जाऊँ!

10. ” कोशिश करने वालों की हार नहीं होती ” – Sohanlal Dwivedi

Sohanlal Dwivedi

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जाकर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जयकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

11. ” हाथी और खरगोश ” – Sohanlal Dwivedi Poems

Sohanlal Dwivedi

खटपट, खटपट, खटपट, खटपट,
क्या करते हो बच्चो, नटखट?
आओ, इधर दौड़ कर झटपट,
तुमको कथा सुनाऊँ चटपट!

नदी नर्मदा के निर्मल तट,
जहाँ जंगलों का है जमघट,
वहीं एक था बड़ा सरोवर,
जिसकी शोभा बड़ी मनोहर!

इसी सरोवर में निशिवासर,
हाथी करते खेल परस्पर।
एक बार सूखा सर वह जब,
तब की कथा सुनो बच्चो अब।

पड़े बड़े दुख में हाथी सब,
कहीं नहीं जल दिखलाया जब
सारे हाथी होकर अनमन,
चले ढूँढ़ने जल को बन बन।

मेहनत कभी न होती निष्फल,
उनको मिला सरोवर निर्मल।
शीतल जल पीकर जी भरकर,
लौटे सब अपने अपने घर।

हाथी वहीं रोज जाते सब,
खेल खेल कर घर आते सब।
किन्तु, सुनो बच्चो चित देकर,
जहाँ मिला यह नया सरोवर।

वहीं बहुत खरगोशों के घर,
बने हुए थे सुन्दर सुन्दर।
हाथी के पाँवों से दब कर,
वे घर टूट बन गए खँडहर!

खरगोशों के दिल गए दहल,
कितने ही खरगोश गए मर,
वे सब थे अनजान बेखबर!

सब ने मिलकर धीरज धारा,
सबने एक विचार विचारा।
जिससे टले आपदा सारी,
ऐसी सब ने युक्ति विचारी।

उनमें था खरगोश सयाना,
जिसने देखा बहुत जमाना।
बात सभी को उसकी भायी,
उसने कहा, करो यह भाई

बने एक खरगोश दूत अब,
काम करे बनकर सपूत सब।
जाकर कहे हाथियों से यह,
उसके सभी साथियों से यह,

हम खरगोश, हमारा यह सर,
श्री खरगोश हमारे नृपवर।
चारु चन्द्र उनका सिंहासन,
जहाँ बैठ देते वे दर्शन!

हमको है नृपवर ने भेजा,
हुक्म उनहोंने हमें सहेजा।
जाकर कहो हाथियों से यह,
उनके सभी साथियों से यह।

अब न कभी तुम सर में आना,
होगा वरना मौत बुलाना!
जुल्म किया तुमने हम पर,
सब घर तोड़ बनाये खँडहर!

अगर नहीं मानोगे कहना,
तुम्हें पड़ेगा संकट सहना।
मैं बिजुली का अंकुश लेकर,
नाश करूँगा तुम्हें पकड़ कर!

इससे अच्छा है मत आओ,
खरगोशों को अब न सताओ।
किसी दूसरे सर को ढूँढ़ो,
अब न कभी आना तुम मूढ़ो!

मुमकिन है सच बात जानकर,
मुमकिन है यह बात मानकर।
हाथी फिर न सरोवर आवें,
और हमारे घर बच जावें।

हुई बात भी कुछ ऐसी ही,
सोची गई घात जैसी ही।
अब आगे की सुनो कहानी,
चला दूत ले हुक्म जबानी।

सभी हाथियों के ढिंग आया,
गरज गरज कर हुक्म सुनाया।
हाथी सहम गए सब सुन सुन,
हाथी सभी हो गए गुन मुन!

किन्तु एक था उनमें बलधर,
वह बोला चिंघाड़ मार कर।
बात तुम्हारी जानूँ सच जब,
बात तुम्हारी मानूँ सच सब!

बातें तुम न मुझे सिखलाओ,
बस अपने नृप को दिखलाओ।
चारु चन्द्र जिनका सिंहासन,
जहाँ बैठ वे देते दर्शन।

बोला दूत, चलो तुम सर को,
मैं दिखलाऊँगा नृपवर को।
आये दूत और हाथी सर,
राह निखरने लगी वहीं पर।

हुई रात जब, झलमल झलमल,
नभ में तारे निकले निर्मल।
खिली चाँदनी, खिला सरोवर,
दृश्य बड़ा ही बना मनोहर।

आया चाँद मनोहर सुन्दर,
नीले नीले आसमान पर।
उसकी छाया निर्मल जल पर,
चमकी अतिशय सुन्दर सुन्दर।

चारु चन्द्र जिनका सिंहासन,
जहाँ बैठ देते वह दर्शन!
हाथी ने देखा तब जल पर,
बिम्ब चन्द्रमा का अति सुन्दर।

बोला दूत, शीश ऊपर कर,
देखो! वहाँ, बीच में, जल पर,
आसमान से अभी उतर कर,
आये श्रीखरगोश नृपतिवर।

अहा! चाँद के बीच मंच पर,
है खरगोश दीखता मनहर!
मन ही मन यह समझा बलधर,
श्रीखरगोश यही हैं नृपवर!

सचमुच हुक्म उन्होंने भेजा,
इसको सचमुच काम सहेजा।
हाथी लौट तुरत सर आया,
बोला, नृपवर से मिल आया।

बोला सभी हाथियों से वह,
बोला सभी साथियों से वह।
जाना ठीक न सचमुच सर में,
जाना मौत बुलाना घर में।

तब से कभी न हाथी आये,
और न उनके साथी आये।
खरगोशों ने युक्ति निकाली,
आयी बला शीश से टाली!

फिर बन गए नये घर सुन्दर,
लहरीं जिनपर लता मनोहर।
हुए सभी खरगोश मगन मन,
रहने लगे खुशी हो छन छन।

12. ” भारतवर्ष ” – Sohanlal Dwivedi

Sohanlal Dwivedi

यह भारतवर्ष हमारा है!
हमको प्राणों से प्यारा है!

है यहाँ हिमालय खड़ा हुआ,
संतरी सरीखा अड़ा हुआ,

गंगा की निर्मल धारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!

क्या ही पहाड़ियाँ हैं न्यारी?
जिनमें सुंदर झरने जारी!

शोभा में सबसे न्यारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!

है हवा मनोहर डोल रही,
बन में कोयल है बोल रही।

बहती सुगंध की धारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!

जन्मे थे यहीं राम सीता,
गूँजी थी यहीं मधुर गीता।

यमुना का श्याम किनारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!

तन मन धन प्राण चढ़ाएँगे,
हम इसका मान बढ़ाएँगे!

जग का सौभाग्य सितारा है!
यह भारतवर्ष हमारा है!

13. ” मूर्ख पंडित ” – Sohanlal Dwivedi Poems

Sohanlal Dwivedi

पंडित चार, पंडित चार,
इनकी सुनो कहानी यार!
सभी पढ़े थे वेद पुरान,
पर न जरा था उनको ज्ञान।

चारों थे पंडित विद्वान,
फिर भी थे पूरे नादान!
सबने मन में किया विचार,
चल विदेश में करें विहार।

घूमें चल कर देश तमाम,
पैदा करें दाम औ’ नाम।
साजे पोथी पत्रा साज,
चले सभी जंगल में आज ।

देखा-मरा पड़ा था शेर,
पथ में था हड्डी का ढेर।
झटपट बोला पंडित एक,
अजी न बातें करो अनेक।

आओ अब अजमावें ज्ञान,
मरे शेर में लावें प्राण।
बहस और झंझट को छोड़,
दीं हड्डियाँ एक ने जोड़।

और एक ने मत्र उचार,
उसमें किया रक्त संचार।
करके यों ही अद्भुत तंत्र,
पढ़ने चला एक जब मंत्र।

बोला तब फिर पंडित एक,
करते क्या सोचो तो नेक।
ठीक नहीं करते यह काम,
होगा नहीं भला परिणाम।

काम कर रहे बिना विचार,
पढ़ लिखकर मत बनो गँवार।
मिली शेर को ज्यों ही जान,
लेगा तुरत तुम्हारे प्रान।

चलो नहीं ऐसी तुम चाल,
पैदा करो न अपना काल।
बात जरा सी लो यह मान,
उनमें बोला चतुर सुजान।

जब तक मैं चढ़ता हूँ पेड़,
तब तक रुको जहाँ है मेंड़।
चढ़ा पेड़ पर जहाँ सुजान,
आगे बढ़े शेष विद्वान।

जहाँ शेर में डाली जान,
गरजा सिंह, उठा बलवान।
थर थर लगे काँपने पाँव,
पंडित भूले सारे दाँव।

थे तीनों पंडित लाचार,
मचा खूब ही हाहाकार।
पर, सुनता था कौन पुकार?
झपट शेर ने डाला मार!

जब भी करो कभी कुछ काम,
पहले ही सोचो परिणाम।

Sohanlal Dwivedi Poems अंतिम शब्द।

तो, आज के लिए बस इतना ही। उपरोक्त सभी (Sohanlal Dwivedi) / सोहनलाल द्विवेदी की कविताएँ हिंदी में पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। हमें खेद है कि इस पोस्ट में हमने सभी सोहनलाल द्विवेदी कविताएँ / Sohanlal Dwivedi के कविताएं नहीं लिखी।

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